Monday, 1 October 2012

एक अनजान शख्स

एक  शख्स जिसे मैं पिछले २१ सालों से समझने की कोशिश कर रहा हूँ ,
कभी तन्हाई में, कभी परछाई में,
कभी दर्द में, कभी रुसवाई में,
कभी सर्द फ़ज़ाओं में ,
कभी साएदार शाख की छाओं में,
हर बार एक मआनी तो मिलता है  
पर हर गस्त के बाद एक और मआनी मिलता है,
हर मआनी में नया मआनी, हर मआनी से नया मआनी,
कुछ मआनी गहराते है, कुछ धूमिल हो जाते है,
फिर एक गस्त,
फिर एक सिलसिला मआनी का,
अब ये ज़िन्दगी किसी शायर के अधूरे ग़ज़ल की तरह लगती है :

कुछ नगमे छोड़ दिए है मैंने, 
चन्द लफ़्ज़ों की तलाश में,
और क्या करे, एक सिलसिला चल चला है,
और वो लफ्ज़ नहीं मिलते |

पर फिर लगता है के उस पार वो लफ्ज़ मेरा इंतज़ार कर रहा है,
वहाँ जाने पर पता चला के ये तो  उस लफ्ज़ का हमशक्ल है |

खैर अब ये ज़िन्दगी तलाश की एक दरिया लगती है,
 और इस दरिया का हर बूंद मुझे उस याद की याद दिलाता है ,
उस परछाई की याद जिसे मैंने अब तक न जाने कितनी दफह आईने में देखा है 
पर अब भी समझ ही रहा हूँ |

Wednesday, 11 July 2012

आग़ाज़-ए-सफ़र

धुंधलाई  सी मंजिल है, इक शुरुआत ज़रूरी है,
बन्जर सी सूनी महफ़िल है, कुछ आग़ाज़ ज़रूरी है ।
ऐ औलाद-ए -आदम क्यों रहता है तू  परेशान 
गिरना तो  फितरत है मगर परवाज़ ज़रूरी है ।

क्यों रहता है तन्हा भीड़  में तू यूं 
के छेड़ दे कोई मसला फिर बात ज़रूरी है ।
के है जो सीने में ये दिल, तो रहता क्यों है सख्त,
हाँ फिर पसीज जा, जज़्बात ज़रूरी है ।

सून्शान जंगल था ये जग बिन रौशनाई के 
के खोजी किसी ने आग, फिर कहा आवाज़ ज़रूरी है ।
अन्धकार से रौशनी और फिर अंधेरापन 
के जैसे दिन के बाद फिर रात ज़रूरी है।

पत्थर उठते जाएंगे सवाल बन के राहों में
तू हल किए जा इन्हें जवाबात ज़रूरी है ।
जो आसानी से हुआ ख़त्म वो कैसा है सफ़र 
के गिर कर हुए खड़े, भिड़े, मुश्किलात ज़रूरी है ।


ज़रूरी है नहीं ये, के कब किसने क्या किया
जो हमने तुमने मिल के की, वो बात ज़रूरी है।
के कितने राज़ सीने में थे दफ्न कर लिए 
फिर आज हुआ महसूस के अलफ़ाज़ ज़रूरी है।