Wednesday, 29 May 2013

फ़रियाद


दिल मेरा है तिश्ना तिश्ना, आब दे असबाब दे,
भीगी भीगी पलकों को, फिर से मीठे ख्वाब दे |

दावा करते मिलकियत के जाहिलो को कर ख़त्म,
जो हो माज़ूर मेरे ऐसे कुछ असहाब दे |

कौन कहता है मोहब्बत इक नज़र में होती है,
जो भी ऐसा सोचते उनको निगाह--हिजाब दे

दिल सुकून पाने पे फिर से देख वालाह हो गया,
ऐसा कर वस्ल--सुकून पे भर के इज़्तिराब दे। 

एक सी तो बात उनकी फिर भी यूं है मुखालफ़त,
ऐसा कर उनको कोई पाषाण युग की किताब दे। 

पीने से हो इस नज़र के पार का सब कुछ नज़र,
या खुदा मुझको कोई ऐसी हलाल शराब दे। 

वक़्त की दानिशवरी में उलझे पड़ते साइंसदान,
उनको औकात--मुहब्बत--आइना--हिसाब दे। 


Wednesday, 17 April 2013

साफ़ साफ़

मुझे फिर से फुलवारी दिखा देना 
कांटो वाली
कांटे छुपाते हुए,
क्यूंकि मै तो
गूंगा हूँ,
बहरा हूँ,
अँधा हूँ
बिलकुल गाँधी जी के विपरीत वाला |

चला देना उस बग़ीचे की ओर
जिसके पत्ते और बीज की दुहाई देकर
कटवाओगे मुझसे
उसके ही जड़ |

क्यूंकि तुमने पढ़ रखे है
व्यवस्थित अराजकता के सारे सिद्धांत
और खुद को एलीट क्लास का कहते हो
और हमें आम आदमी |

अगर तुम्हे ऐसा लगता है,
तो इस ग़लतफ़हमी से बाहर निकलो
क्यूंकि हमें दिखने लगा है
सब कुछ साफ़ साफ़ |

--असीर

Monday, 28 January 2013

आज़ाद है हम जो



आज़ाद है हम जो युँ आज़ाद नहीं है, 
बर्बाद है क्युं आबाद नहीं है ?

आज़ाद है नेता यहाँ पैसे कमाने को,
और बेच के कस्बा-ओ-मुल्क सोना चबाने को,
भिखमंगे सारे वोट माँगे सर झुका के ये,
मौके पे हाथी दाँत कुछ कुछ दिखाने को,
है सूँढ इनका लम्बा सिर्फ पीने के लिये,
बरसात के मौसम मे मेंढक आँसु बहाने को l

हैवानियत इन्सानियत मे फर्क अब नहीं,
हैवान है हैवान इन्सान इन्सान है नहीं l

हर शख्स है परेशान यहाँ रोटी कमाने को,
हर औरत यहाँ अपनी इज़्ज़त बचाने को l

सौ चक्करे सौ नोट काफ़ी नहीं है अब,
दफ़्तर मे दफ़्न फ़ाइले ज़िन्दा कराने को l

जीना नहीं आसान इस मुल्क मे मगर,
हम कोस्ते नहीं फिर भी ज़माने को l

रहबर नहीं है जो, तो राह क्या करे,
चलते है हम मगर तलवे जलाने को l

सुनके मेरी सदा पर्दे मे न सिसक,
ले हाथ मे मशाल दुनिया हिलाने को l

कूवत मे जो तेरे वो करके तु दिखा,
है वक़्त अब नहीं तबीयत सुनाने कोl

Monday, 1 October 2012

एक अनजान शख्स

एक  शख्स जिसे मैं पिछले २१ सालों से समझने की कोशिश कर रहा हूँ ,
कभी तन्हाई में, कभी परछाई में,
कभी दर्द में, कभी रुसवाई में,
कभी सर्द फ़ज़ाओं में ,
कभी साएदार शाख की छाओं में,
हर बार एक मआनी तो मिलता है  
पर हर गस्त के बाद एक और मआनी मिलता है,
हर मआनी में नया मआनी, हर मआनी से नया मआनी,
कुछ मआनी गहराते है, कुछ धूमिल हो जाते है,
फिर एक गस्त,
फिर एक सिलसिला मआनी का,
अब ये ज़िन्दगी किसी शायर के अधूरे ग़ज़ल की तरह लगती है :

कुछ नगमे छोड़ दिए है मैंने, 
चन्द लफ़्ज़ों की तलाश में,
और क्या करे, एक सिलसिला चल चला है,
और वो लफ्ज़ नहीं मिलते |

पर फिर लगता है के उस पार वो लफ्ज़ मेरा इंतज़ार कर रहा है,
वहाँ जाने पर पता चला के ये तो  उस लफ्ज़ का हमशक्ल है |

खैर अब ये ज़िन्दगी तलाश की एक दरिया लगती है,
 और इस दरिया का हर बूंद मुझे उस याद की याद दिलाता है ,
उस परछाई की याद जिसे मैंने अब तक न जाने कितनी दफह आईने में देखा है 
पर अब भी समझ ही रहा हूँ |

Wednesday, 11 July 2012

आग़ाज़-ए-सफ़र

धुंधलाई  सी मंजिल है, इक शुरुआत ज़रूरी है,
बन्जर सी सूनी महफ़िल है, कुछ आग़ाज़ ज़रूरी है ।
ऐ औलाद-ए -आदम क्यों रहता है तू  परेशान 
गिरना तो  फितरत है मगर परवाज़ ज़रूरी है ।

क्यों रहता है तन्हा भीड़  में तू यूं 
के छेड़ दे कोई मसला फिर बात ज़रूरी है ।
के है जो सीने में ये दिल, तो रहता क्यों है सख्त,
हाँ फिर पसीज जा, जज़्बात ज़रूरी है ।

सून्शान जंगल था ये जग बिन रौशनाई के 
के खोजी किसी ने आग, फिर कहा आवाज़ ज़रूरी है ।
अन्धकार से रौशनी और फिर अंधेरापन 
के जैसे दिन के बाद फिर रात ज़रूरी है।

पत्थर उठते जाएंगे सवाल बन के राहों में
तू हल किए जा इन्हें जवाबात ज़रूरी है ।
जो आसानी से हुआ ख़त्म वो कैसा है सफ़र 
के गिर कर हुए खड़े, भिड़े, मुश्किलात ज़रूरी है ।


ज़रूरी है नहीं ये, के कब किसने क्या किया
जो हमने तुमने मिल के की, वो बात ज़रूरी है।
के कितने राज़ सीने में थे दफ्न कर लिए 
फिर आज हुआ महसूस के अलफ़ाज़ ज़रूरी है।