Wednesday, 17 April 2013

साफ़ साफ़

मुझे फिर से फुलवारी दिखा देना 
कांटो वाली
कांटे छुपाते हुए,
क्यूंकि मै तो
गूंगा हूँ,
बहरा हूँ,
अँधा हूँ
बिलकुल गाँधी जी के विपरीत वाला |

चला देना उस बग़ीचे की ओर
जिसके पत्ते और बीज की दुहाई देकर
कटवाओगे मुझसे
उसके ही जड़ |

क्यूंकि तुमने पढ़ रखे है
व्यवस्थित अराजकता के सारे सिद्धांत
और खुद को एलीट क्लास का कहते हो
और हमें आम आदमी |

अगर तुम्हे ऐसा लगता है,
तो इस ग़लतफ़हमी से बाहर निकलो
क्यूंकि हमें दिखने लगा है
सब कुछ साफ़ साफ़ |

--असीर

2 comments:

  1. dis is gud stuff man...bohot badhiya vocabulary n style of writin..jitna mjhe smjh aata hai, dis shud b promoted...! =)

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  2. शुक्रिया भाई हौसलाअफजाई के लिए

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