Monday, 1 October 2012

एक अनजान शख्स

एक  शख्स जिसे मैं पिछले २१ सालों से समझने की कोशिश कर रहा हूँ ,
कभी तन्हाई में, कभी परछाई में,
कभी दर्द में, कभी रुसवाई में,
कभी सर्द फ़ज़ाओं में ,
कभी साएदार शाख की छाओं में,
हर बार एक मआनी तो मिलता है  
पर हर गस्त के बाद एक और मआनी मिलता है,
हर मआनी में नया मआनी, हर मआनी से नया मआनी,
कुछ मआनी गहराते है, कुछ धूमिल हो जाते है,
फिर एक गस्त,
फिर एक सिलसिला मआनी का,
अब ये ज़िन्दगी किसी शायर के अधूरे ग़ज़ल की तरह लगती है :

कुछ नगमे छोड़ दिए है मैंने, 
चन्द लफ़्ज़ों की तलाश में,
और क्या करे, एक सिलसिला चल चला है,
और वो लफ्ज़ नहीं मिलते |

पर फिर लगता है के उस पार वो लफ्ज़ मेरा इंतज़ार कर रहा है,
वहाँ जाने पर पता चला के ये तो  उस लफ्ज़ का हमशक्ल है |

खैर अब ये ज़िन्दगी तलाश की एक दरिया लगती है,
 और इस दरिया का हर बूंद मुझे उस याद की याद दिलाता है ,
उस परछाई की याद जिसे मैंने अब तक न जाने कितनी दफह आईने में देखा है 
पर अब भी समझ ही रहा हूँ |

1 comment:

  1. Bhai bht sahi hai...kuch kumar vishwaas type ka likh na apne wrds me...hmko jyada idea nhi hai bt sunne me bht sahi lagta hai..

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